Thursday, June 14, 2018

महत्‍वपूर्ण आर्थिक शब्‍दावली


महत्‍वपूर्ण आर्थिक शब्‍दावली


1.   समष्टि तथा व्यष्टि अर्थशास्‍त्र (मैंक्रो तथा माइक्रो इकोनामिक्‍स) : अर्थशास्‍त्री, अर्थव्‍यवस्‍था को दो तरीके से देखते है, समष्टि(मैंक्रो) अर्थशास्‍त्र तथा व्‍यष्टि(माइक्रो) अर्थशास्‍त्र। मैंको अर्थशास्‍त्र (यूनानी भाषा में मैंक्रो का अर्थ  वृहद होता है) अर्थव्‍यवस्‍था की गतिविधियों को एक समग्र रूप में देखता है, जैसे मुद्रास्‍फीति रोजगार की दर, आर्थिक विकास, व्‍यापार संतुलन आदि। व्‍यष्टि(माइक्रो)अर्थशास्‍त्र (यूनानी भाषा में व्‍यष्टि का अर्थ छोटा होता है। इकाइयों के गतिविधियों का अध्‍ययन है, जैसे व्‍यक्ति, परिवार, कम्‍पनियॉं, एक विशेष उद्योग; जो मिलकर एक अर्थव्‍यवस्‍था का निर्माण करते है।
नोट : 1933 में अर्थशास्‍त्र में मैक्रो और माइक्रों शब्‍द का प्रयोग सर्वप्रथम रगनार फ्रिस्‍क ने किय था।
1.   भारत की संप्रभु रेटिंग : वर्तमान में भारत का छह अन्‍तर्राष्‍ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों स्‍टैंडर्ड एंड पूर्वस (एस एण्‍ड पी), मुडीज इनवेस्‍टर्स सर्विसेज, फिच, डोमिनयम बॉन्‍ड रेटिंग सर्विस(डीबीआरएस), जापानी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी (जेसीआरए) और रेटिंग एंड इनवेस्‍टमेंट इनफॉर्मेशन इंक टोक्‍यो (टीआईएम) रेटिंग देती है। इन क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की सूचना के प्रवाह को सुव्‍यवस्थित किया गया है।
2.   टोबिन कर : यह नोबेल पुरस्‍कार विजेता अर्थशास्‍त्री जेम्‍स टोबिन द्वारा प्रस्‍तावित किया गया है। यह प्रस्‍तावित लघु कर सभी विदेशी विनिमय बाजार में अस्थिरता को रोका जा सके। टोबिन कर दुनिया भर में कही भी कार्यान्वित नहीं किया गया।
3.   कर्ब डीलिंग : शेयर बाजार के बाहर होने वाले सभी व्‍यापार को कर्ब डींलिंग कहते है।
4.   बजट : किसी संस्‍था या सरकार के एक वर्ष की अनुमानित आय-व्‍यय का लेखा-जोखा बजट कहलाता है, सरकार का बजट अब केवल आय-व्‍यय का विवरण मात्र ही नहीं होता, अपितु यह सरकार के क्रिया-कलापों एवं नीतियों का विवरण भी है। यह आधुनिक काल में सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का साधन भी बन गया है।
5.   बफर स्‍टॉक : आपात स्थिति में किसी वस्‍तु की कमी को पूरा करने क लिए वस्‍तु का स्‍टॉंक तैयार करना बफर स्‍टॉक कहलाता है।
6.   तेजडिया और मंदडिया : यह स्‍टॉंक एक्‍सचेंस के शब्‍द हैं, जो व्‍यक्ति स्‍टॉक की कीमतें बढाना चाहता है, तेजडिंया कहलाता है, जो व्‍यक्ति स्‍टॉंक कीमतें गिरने की आशा करके किसी वस्‍तु को भविष्‍य में देने का वायदा करके बेचता है, यह मं‍दडिया कहलाता है।
7.   क्रेता बाजार : जब किसी वस्‍तु की मॉग कम तथा पूर्ति अधिक होती है, जो विक्रेता की तुलना में क्रेता बेहतर स्थिती में होता है, ऐसे बाजार को क्रेता बाजार कहते है।
8.   ब्रिज लोन : कम्‍पनियॉं प्राय: अपनी पूँजी का विस्‍तार करने के लिए नये शेयर तथा डिबेंचर्स जारी करती है, कम्‍पनी को शेयर जारी करके पूँजी जुटाने में तीन माह से भी अधिक समय लगता है। इस समयावधि में अपना काम जारी रखने के लिए कम्‍पनियॉं बैंकों से अन्‍तरिम अवधि के लिए ऋण प्राप्‍त कर लेती है। इस प्रकार के ऋणों को ब्रिज लोन कहते है।
9.   फ्लोटिंग ऑफ करेंसी : किसी मुद्रा की विनिमय दर को स्‍वतन्‍त्र छोड देना, ताकि मॉंग और पूर्ति की दशओं के आधार पर वह अपना नया मूल्‍य स्‍वयं तय कर सके।
10. अवमूल्‍यन : यदि किसी मुद्रा का विनिमय मूल्‍य अन्‍रू मुद्राओं की तुलना में जान-बुझकर कम कर दिया जाता है, तो इसे उस मुद्रा का अवमूल्‍यन कहते है। यह अवमूल्‍यन परिस्थितियों के अनुसार सरकार स्‍वयं करती है।
11. विमुद्रीकरण : जब काला धन बढ जाता है और अर्थव्‍यवस्‍था के लिए खतरा बन जाता है, तो इसे दूर करने के लिए विमुद्रीकरण की विधि अपनाई जाती है, इसके अन्‍तर्गत सरकार पुरानी मुद्रा को समाप्‍त कर देती है और नई मुदा चालू कर देती है। जिनके पास काला धन होता है, वह उसके बदले में नई मुदा लेने का साहस नहीं जुटा पाते हैं और काला धन स्‍वयं ही नष्‍ट हो जाता है।
12. मुद्रा संकुचन : जब बाजार मं मुद्रा की कमी के कारण कीमतें गिर जाती है, उत्‍पादन व व्‍यापार गिर जाता है और बेरोजगारी बढती है, वह अवस्‍था मुद्रा-संकुचन कहलाती है।
13. एस्‍टेट ड्यूटी : किसी व्‍यक्ति की मृत्‍यु के पश्‍चात् असकी सम्‍पत्ति के हस्‍तान्‍तरण के समय जो कर उस सम्‍पत्ति पर लगाया जाता है, उसे एस्‍टेट ड्यूटी कहते है।
14. हीनार्थ प्रबन्‍धन : जब सरकार का बजट घाटें का होता है, अर्थात आय कम होती है, और व्‍यय अधिक होता है और व्‍यय के इस अधिक्‍य को केन्‍द्रीय बैंक से ऋण लेकर अथवा अतिरिक्‍त पत्र मुद्रा निर्गमित कर पूरा किया जाता है, तो यह व्‍यवस्‍था घाटे की वित्त व्‍यवस्‍था अथवा हीनार्थ प्रबन्‍धन कहलाती है। सीमित यात्रा में ही इसे उचित माना जाता है, हीनार्थ प्रबन्‍धन को स्‍थायी नीति बना लेने के परिणाम अच्‍छे नहीं होते।
15. स्‍वर्ण मान : जब किसी देश की प्रधान मुद्रा स्‍वर्ण में परिवर्तनशील होती है, अथवा मुद्रा का मूल्‍य सोने में मापा जाता है, तो इस मौद्रिक व्‍यवस्‍था को स्‍वर्ण मान कहते है, अब किसी देश में स्‍वर्ण मान नहीं है।
16. मुद्रास्‍फीति : मुदा-प्रसार या मुद्रास्‍फीति वह अवस्‍था है जिसमें मुद्रा का मूल्‍य गिर जाता है और कीमतें बढ जाती है, आर्थिक दृष्टि से सीमित एवं नियंत्रित मुद्रास्‍फीति अल्‍प-विकसित अर्थव्‍यवस्‍था हेतु लाभदायक होती है, क्योंकि उससे उत्‍पादन में वृद्धि को प्रोत्साहन मिलता है, किन्तु एक सीमा से अधिक मुद्रास्‍फीति हानिकारक है। मुद्रास्‍फीति को अस्थायी तौर पर नियंत्रित करने के लिए मुद्रा-आपूर्ति की कमी का प्रयोग किया जा सकता है।
17. रिसेशन : रिसेशन से तात्‍पर्य मन्‍दी की अवस्‍था से है, जब वस्‍तुओं की पूर्ति की तुलना में मॉंग कम हो तो रिसेशन की स्थिति उत्‍पन्‍न होती है। ऐसी स्थिति में धनाभाव के कारण लोगों की क्रय-शक्ति कम होती है और उत्पादित वस्‍तुऍं अनबिकी रह जाती है, इससे उघोग को बंद करने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है, बेरोजगारी बढ जाती है। 1930 के दशक में विश्वव्यापी रिसेशन की स्थिति उत्‍पन्‍न हुई थी।
18. प्राइमरी गोल्‍ड : 24 कैरेट के शुद्ध सोने को प्राइमरी गोल्‍ड कहते है।
19. स्‍टैगफ्लेशन : यह अर्थव्‍यवस्‍था की ऐसी स्थिति है जिसमें मुद्रास्‍फीति के साथ-साथ मंदी की स्थिति होती है।
20. टैरिफ : किसी देश द्वारा आयातों पर लगाये गये कर को ही टैरिफ कहा जाता है।
21. मुद्रा अपस्‍फीति अथवा विस्‍फीति : मुद्रास्‍फीति पर नियंत्रण लाने हेतु जो प्रयास किये जाते है (जैसे साख-नियंत्रण) उनके परिणामस्‍वरूप मुद्रास्‍फीति की दर घटने लगती है, यह स्थिती मुद्रा अपस्‍फीति अथवा विस्‍फीति की स्थिति कहलाती है। इस स्थिति में यद्यपि मूल्‍य-स्‍तर गिरता है तथापि यह सामान्‍य मूल्‍य स्‍तर से ऊपर ही रहता है।
22. एक्टिव शेयर : वैसे शेयर जिनका क्रय-विक्रय नियमित रूप से प्रतिदिन शेयर बाजार में होता है एक्टिव शेयर कहलाते है।
23. राइट शेयर : किसी कम्‍पनी द्वारा जारी नये शेयरों को क्रय करने का पहला अधिकार वर्तमान शेयर होल्डर को होता है। वर्तमान शेयरहोल्डर के इस अधिकार को पूर्ण क्रय का अधिकार कहा जाता है। तथा इस अधिकार के कारण उनको जो शेयर प्राप्‍त होता है, उसे राइट शेयर कहा जाता है।
24. बोनस शेयर : जब किसी कम्‍पनी द्वारा अपने अर्जित लाभों में से रखे नये रिजर्व को शेयर के रूपर में वर्तमान शेयरहोल्डरों के मध्‍य आनुपातिक रूपर से बांट दिया जाता है तो इसे बोनस शेयर कहा जाता है।
25. ब्‍लो आउट : जब कोई कंपनी अपना नया इश्‍यू जारी करती है और उसका सब्‍सक्रिप्‍शन पहले ही दिन पूरा होकर बंद हो जाता है तो उसे ब्‍लो आउट या आउट ऑफ विंडो कहा जाता है।
26. इनसाइडर ट्रेडिंग : यह एक अवैध कार्य है। जब उन व्यक्तियों द्वारा भारी मात्रा में शेयरों का क्रय-विक्रय करके लाभ कमाया जाता है, जिनके पास कम्‍पनियों की गुप्त सूचनाएं रहती हैं, तो इस प्रकार के शेयरों के क्रय-विक्रय को इनसाइडर ट्रेडिंग कहा जाता है।
27. कैश ट्रेडिंग : कैश ट्रैडिंग के अन्‍तर्गत शेयर सर्टिफिकेट तथा नगद धनराशि का लेन-देन अगली समायोजन तिथि से पहले ही हो जाना चाहिए। जब दलालों के सभी कैश ट्रेडिंग के लेन-देनों का समायोजन हो जाता है तो इस समायोजन तिथि कहा जाता है। परन्‍तु यह 14 दिन से अधिक नहीं हो सकती है।
28. स्‍टैग : स्‍टैग उन व्यक्तियों को कहते हैं, जो नई कंपनियों के इश्‍यू में भारी मात्रा में शेयरों के आवेदन-पत्र प्रेषित करते है। इनको यह आशा रहती है कि जब कुछ व्यक्तियों को शेयर नहीं मिलेंगे तो वे इन शेयरों को बड़े मूल्‍य पर खरीदने को तैयार हो जायेंगे। इस व्‍यक्ति केवल आवेदन पत्र की राशि प्रेषित करते है तथा शेयर आवंटित होते ही बेच देते है।
29. बदला : जब कोई दलाल भविष्‍य के लिए सौदा करता है, परन्‍तु भविष्‍य की तिथि पर सौदा पूरा न करके आगे के लिए खिसकता रहता है तो कार्य के लिए उसे जो चार्ज देने पडते है, उसे बदला कहा जाता है। यदि यह कार्य तेजडि़यों द्वारा किया जाता है, तो इसे सीधा बदला तथा मंदडि़यों द्वारा किया जाता है तो इसको अंधा बदला कहा जाता है।
30. फ्लोटिंग स्‍टॉक : किसी कंपनी की चूकता पूँजी का वह भाग फ्लोटिंग स्‍टॉक कहलाता है जो शेयर बाजार में क्रय विक्रय के लिए उपलब्‍ध रहता है।
31. ग्रे मार्केट : यह अनाधिकृत बाजार होता है, जहॉ नयी तथा अभी शेयर बाजार में सूचीबद्ध न हुई प्रतिभूतियों का प्रीमियम पर लेन-देन होता है। ये सौदे भी अनाधिकृत होते है। इन सौदों को शेयर का संरक्षण नहीं होता है।
32. ट्रेडिंग लॉट : शेयरों की वह न्‍यूनतम संख्‍या या गुणांक को ट्रेडिंग लॉट कहा जाता है, जिसे शेयर बाजार में एक बार में बेचा या क्रय किया जा सकता है। सामान्‍यत: 10 रुपये मूल्‍य वाले शेयरों की न्‍यूनतम संख्‍या 50 से 100 निर्धारित की जाती है, जबकि 100 रुपये मूल्‍य वाले शेयरों की संख्‍या 5 या 10 निर्धारित की जाती है।
33. शॉर्ट सेलिंग : जब किसी दलाल द्वारा इतने शेयरों की बिक्री की जाती है, जितने इसके पास शेयर नहीं होते है तो इसे शॉर्ट सेलिंग कहा जाता है। अनुबंध पूरा करने के लिए दलाल द्वारा नीलमी में शेयर क्रय किये जाते है।

नई आर्थिक सुधार नीति से सम्‍बद्ध कुछ महत्‍वपूर्ण शब्‍दावली
·         निजीकरण : सार्वजनिक क्षेत्र में पूँजी या प्रबंधन या दोनों में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढाना अथवा उन्‍हें निजी क्षेत्र को सौंप देना ही निजीकरण है।
·         उदारीकरण : उदारीकरण, सरकारी नियंत्रण को शिथिल या समाप्‍त करने क्रिया विधि है। इसके अन्‍तर्गत निजीकरण भी शामिल होता है।
·         विश्‍वव्‍यापीकरण : किसी अर्थव्‍यवस्‍था को विश्‍व-अर्थव्‍यवस्‍था से जोड़ने की क्रिया ही विश्‍वव्‍यापीकरण है। ऐसा करने से उक्‍त्त क्षेत्र में निजी कार्यकुशलता तथा बाहरी तकनीकी ज्ञान प्राप्‍त होते हैं।
·         विनिवेश : सरकारी क्षेत्र में सरकारी हिस्‍सेदारी को कम करना ही विनिवेश कहलाती है।

अर्थशास्‍त्र : तथ्‍य


अर्थशास्‍त्र :  तथ्‍य

अर्थशास्‍त्र की परिभाषा
·         रॉबिन्‍स : अर्थशास्‍त्र व विज्ञान है, जोकि लक्ष्‍यों एवं वैकल्पिक उपयोगों वाले सीमित साधनों के परस्‍पर सम्‍बन्‍धों के रूप में मानव व्‍यवहार का अध्‍ययन करता है।
·         मार्क्‍स : अर्थशास्‍त्र का उद्देश्‍य मानव समाज की प्रगति के नियम की खोज करना है।
·         बेनहम : अर्थशास्‍त्र उन तत्‍वों का अध्‍ययन है जो रोजगार और जीवन-स्‍तर को प्रभावित करते है।
·         प्रो. फ्रैडमैन : अर्थशास्‍त्र कभी वास्‍तविक विज्ञान होता है और कभी आदर्श विज्ञान।

महत्‍वपूर्ण सिद्धांत
1.   ऐंगल का सिद्धांत : इस सिद्धांत के अनुसार एक परिवार की आय बढनें पर उसका खाने-पीने की वस्‍तुओं पर खर्च का प्रतिशत कम हो जाता है।
2.   ग्रेशम का नियम : यदि किसी देश में घटिया और बढिया दो प्रकार की मुद्राऍं एक साथ चलन में हो तो घटिया मुद्राऍं बढिया मुद्राओं को चलन से बाहर कर देती है।
3.   उत्‍पत्ति हृास का नियम : यदि किसी वस्‍तु के उत्‍पादन में किसी एक परिर्वनशील साधन की मात्रा में वृद्धि की जाए तथा अन्‍य साधनों को स्थिर रखा जाए, तो एक निश्चित बिन्‍दु के पश्‍चात परिवर्तित साधन की अतिरिक्‍त मात्राओं से प्राप्‍त सीामान्‍त उत्‍पादन घटता चला जाता है। इस प्रवृत्ति को अर्थशास्‍त्र में उत्‍पत्ति हृास नियम का हृासमान प्रतिफल का सिद्धांत कहते है।
4.   कीन्‍स का रोजगार सिद्धांत : इन्‍होंने 1936 में प्रकाशित अपनी पुस्‍तक जेनरल थ्‍योरी ऑफ इम्‍प्‍लायमेंट इन्‍टरेस्‍ट एण्‍ड मनी की प्रस्‍तावना में 'से' के बाजार नियम पर घातक प्रहार किया और प्रतिष्‍ठीत विचारधारा को अस्‍वीकृत करते हुये रोजगार का एक क्रमबद्ध तथ व्‍यस्थित सिद्धांत प्रस्‍तुत किया। कीन्‍स के अनुसार अर्थव्‍यवस्‍था में रोजगार का स्‍तर कुल उत्‍पादन मात्रा पर निर्भर करता है। कुल उत्‍पादन मात्रा प्रभावपूर्ण मांग की मात्रा पर निर्भर करती है। अर्थात रोजगार की मात्रा प्रभापूर्ण मांग पर निर्भर करती है। पूँजीवादी अर्थव्‍यवस्‍था में प्रभावपूर्ण मांग या असमर्थ मांग में कमी से बेरोजगारी उत्‍पन्‍न होती है।
5.   नकदी लेन-देन सिद्धांत : इसका प्रतिपादन फिशर ने किया था। इस सिद्धांत के अनुसार मुद्रा का परिमाण ही कीमत स्‍तर अथवा मुद्रा के मुल्‍य का मुख्‍य निर्धारक है। फिशर के अनुसार, यदि अन्‍य चीजें स्थिर रहें, तो ज्‍यो-ज्‍यों मुद्रा-संचालन की मात्रा बढती है त्‍यों-त्‍यों कीमत स्‍तर भी प्रत्‍यक्ष अनुपात में बढता है और मुद्रा का मूल्‍य भी घटता है और विलोमश: भी। यदि मुद्रा की मात्रा दूगुनी कर दी जाये तो कीमत स्‍तर भी दूगुना हो जायेगा और मुद्रा का मूल्‍य आधा हो जायेगा और ठीक इसके विपरीत यदि मुद्रा की मात्रा घटकर आधी हो जाये तो कीमत स्‍तर गिरकर आधा रह जायेगा और मुद्रा का मूल्‍य दूगूना हो जायेगा।
6.   'से' का बाजार नियम: पूर्ति स्‍वयं अपनी मांग उत्‍पन्‍न करती है। यह नियम वस्‍तु विनियम और मुद्रा विनियम दोनों पर लागू होते हैं। इसके अनुसार अर्थव्‍यवस्‍था में सामान्‍य अत्‍युत्‍पादन के फलस्‍वरूप सामान्‍य बेरोजगारी उत्‍पन्‍न होती है।
नोट : अर्थव्‍यवस्‍था में वह मांग समर्थ मांग होती है जहॉं अर्थव्‍यवस्‍था में रोजगार स्‍तर (एन) उत्‍पादन स्‍तर (ओ) तथा आय स्‍तर (वाय) तीनों बराबर हो।

कुछ प्रमुख कथन
अर्थशास्‍त्र चुनाव का विज्ञान है।
रॉबिन्‍स
अर्थशास्‍त्र वास्‍तविक विज्ञान है।
रॉबिन्‍स
अर्थशास्‍त्र आदर्श विज्ञान है।
मार्शल
अर्थशास्‍त्री का कार्य विश्‍लेषण करना है, निन्‍दा करना नहीं।
रॉबिन्‍स
आवश्‍यकता विहीनता का लक्ष्‍य सुख प्रदान करता है।
जे.के. मेहता

उत्‍पादन फलन
·         उत्‍पादन के साधनों तथा उत्‍पादन की मात्रा में सम्बन्ध को उत्‍पादन फलन कहते है। यह साधनों तथा उत्पाद के बीच तकनीकी सम्बन्ध को प्रकट करता है।
·         जब कूल उत्‍पादन अधिकतम होता है तो सीमान्‍त उत्पाद शून्य होता है।
·         सीमान्‍त उत्पाद शून्य और ऋणात्‍मक हो सकता है लेकिन औसतन उत्पाद न तो कभी शून्य हो सकता है और न ही ऋणात्‍मक।
·         कॉब-डगलस उत्‍पादन फलन : इस उत्‍पादन फलन को कॉब ओर डगलस नामक दो अर्थशास्त्रियों ने प्रतिपादित किया था इसलिए यह फलन उनके नाम से जाना जाता है। यह फलन रेखीय समरूप फलन का एक रूप है।

अर्थशास्‍त्र : प्रमुख पुस्‍तक

पुस्‍तक
लेखक
1
वेल्‍थ ऑफ नेशन्‍स
एडम स्मिथ
2
फाउंडेशन ऑफ इकोनोमिक एनालिसिस
सेम्‍युल्‍सन
3
प्रिंसिपल्‍स ऑफ इकोनोमिक्‍स
मार्शल
4
नेचन एण्‍ड सिग्‍नीफिकेन्‍स ऑफ इकोनोमिक साइंस
रॉबिन्‍स
5
दास कैपिटल
कार्ल मार्क्‍स
6
द थ्‍योरी ऑफ इम्‍प्‍लायमेंन्‍ट इन्‍टरेस्‍ट एण्‍ड मनी
जे.एम.केन्‍ज
7
जेनरल थ्‍योरी ऑफ इम्‍प्‍लायमेंट इन्‍टरेस्‍ट एण्‍ड मनी
कीन्‍स
8
हाऊ दू पे फॉर वार
कीन्‍स


मांग
·         प्रभावपूर्ण इच्‍छा ही मांग है।
·         यदि अन्‍य बातें सामान्‍य रहें तो मूल्‍य बढने से मांग घटती है और मूल्‍य घटने से मांग बढती है।
·         गिफिन वस्‍तओं में मांग का नियम लागू नहीं होता है।

गिफिन वस्‍तुऍं : गिफिन वस्‍तुऍं निम्‍न कोटि की वस्‍तुऍं होती है। मूल्‍य मं वृद्धि होने पर गिफिन वस्‍तुओं की मांग बढ जाती है तथा मूल्‍य में कमी होने पर इसकी मांग कम हो जाती है। इस विरोधाभास को गिफिन विरोधाभास की संज्ञा प्रदान की गयी।

मुद्रा के मूल्‍य में परिवर्तन
मुद्रा मं होने वाले परिवर्तनों के मुख्‍य चार रूप होते है --
1.   मुद्रास्‍फीति
2.   अवस्‍फीति अथवा मुद्रा-संकूचन
3.   मुद्रा-संस्‍फीति
4.   मुद्रा-अवस्‍फीति
·         मुद्रास्‍फीति : मुद्रास्‍फीति व स्थिति है जिसमें कीमत स्‍तर में वृद्धि होती है तथा मुद्रा का मूल्‍य गिरता है। यानी मुद्रास्‍फीति व अवस्‍था है जब वस्‍तुओं की उपलब्‍ध मात्रा की तुलना में मुद्रा तथा साख की मात्रा में अधिक वृद्धि होती है और परिणामस्‍वरूप मूल्‍य स्‍तर में निरन्‍तर व महत्‍वपूर्ण वृद्धि होती है।
·         मुद्रास्‍फीति का प्रभाव :
o    उत्‍पादक वर्ग (कृषक, उद्योगपति, व्‍यापारी) को लाभ होता है।
o    ऋणी को लाभ तथा ऋणदाता को हानि होती है।
o    निश्चित आय वाले वर्ग को हानि होती है जबकि परिवर्तित आय वाले वर्ग को लाभ होता है।
o    समाज में आर्थिक विषमताऍं बढ जाती है धनी वर्ग और धनी तथा निर्धन वर्ग और निर्धन होता चला जाता है।
o    व्‍यापार संतुलन विपक्ष में हो जाता है क्‍योंकि आयात में वृद्धि तथा निर्यात में कमी हो जाती है।
·         मुद्रास्‍फीति को‍ नियंत्रित करने के उपाय
o    राजकोषीय उपाय
·         संतुलित बजट बनाना
·         सार्वजनिक व्‍यय विशेषकर अनुत्‍पादक व्‍यय पर नियंत्रण रखना
·         प्रगतिशील करारोपण
·         सार्वजनिक ऋण मं वृद्धि करना
·         बचत को प्रोत्‍साहित करना
·         उत्‍पादन में वृद्धि करना
o    मौद्रिक उपाय
·         मुद्रा निर्गमन के नियमों का कठोर बनाना
·         मुद्रा की मात्रा को संकुचित करना
·         कठोर सााख नीति अपनाना।
·         मुद्रा-संकुचन अ‍थवा अवस्‍फीति : यह मुद्रास्‍फीति की विपरीत अवस्‍था है इसमें मुद्रा का मूल्‍य बढता है और वस्‍तुओं एवं सेवाओं का मूल्‍य घटता है। प्रो. पीगू के अनुसार मुद्रा-संकुचन निम्‍न परिस्थितियों के दो प्रमुख कारण है-
o    उत्‍पादन में वृद्धि मुद्रा की मात्रा से अधिक होती है।
o    मूल्‍यों में गिरावट आती रहती है।
·         मुद्रा-संकुचन को रोकने का उपाय
o    मौद्रिक उपय
·         मुद्रा का अधिक निर्गमन
·         साख मुद्रा का विस्‍तार
o    राजकोषीय उपाय
·         सार्वजनिक व्‍यय में वृद्धि
·         करारोपण में कमी
·         ऋणों का भुगतान
·         आर्थिक सहायता एवं अनुदान में वृद्धि
o    अन्‍य उपाय
·         निर्यात में वृद्धि तथा आयात में कमी
·         पूर्ति पर नियंत्रण।
·         मुद्रा अवस्‍फीति अर्थव्‍यवस्‍था मं आर्थिक क्रियाओं को समाप्‍त करके बेरोजगारी बढाती है, जिसमें सम्‍पूर्ण अर्थव्‍यवस्‍था निष्क्रिय एवं निर्जीव होकर मंदी के दौर में फंस जाती है।
·         मुद्रा संस्‍फीति : वह प्रक्रिया है जिसमें जान-बुझकर मुद्रा और साख की मात्रा में वृद्धि करके वस्‍तु-मूल्‍यों मं वृद्धि का प्रयास किया जाता है। संस्‍फीति प्राय: अर्थव्‍यवस्‍था में व्‍याप्‍त मंदी से छूटकारा प्राप्‍त करने के लिए किया जाता है।
नोट : मुद्रास्‍फीति और संस्‍फीति की प्रकृति लगभग एक-सी होती है। दोनों में ही मुद्रा की मात्रा बढती है तथा कीमतों में वृद्धि होती है, परन्‍तु दोनों में कुछ महत्‍वपूर्ण अंतर होता है। संस्‍फीति जान-बूझकर नियंत्रणात्‍मक रूपर से बिगडी हुई स्थिती को सुधारने के लिए अपनायी जाती है जबकि मुद्रास्‍फीति प्राय: अनियन्त्रित एवं परिस्थितिजन्‍य होती है।
·         मुद्रा अपस्‍फीति : मुद्रा अपस्‍फीति के अन्‍तर्गत वे सब क्रियाऍं, नीतियॉं व उपाय आते हैं, जो मुद्रास्‍फीति के वेग को रोकने के लिए किये जाते हैं।
·         मुद्रा अपस्‍फीति एवं मुदा-संकुचन में तुलना
o    मुद्रा-संकुचन या विस्‍फीति देश में मंदी की स्थिति उत्‍पन्‍न करती है जबकि मुद्रा अपस्‍फीति कीमत स्‍तर को सामान्‍य अवस्‍था में लाने के लिए की जाती है।
o    मुद्रा अपस्‍फीति नियोजित रूपर में एक निर्धारित नीति के अनुसार की जाती है जबकि मुद्रा-संकुचन स्‍वयं उत्‍पन्‍न होती है।
o    मुद्रा अपस्‍फीति देश की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए होती है, ज‍बकि मुद्रा-संकुचन से देश को हानि होती है।
o    मुद्रा-संकुचन एवं मुद्रा उपस्‍फीति दोनों ही गिरती हुई कीमतों का सूचक है तथा दोनों की प्रकृति लगभग एक-सी होती है।

अर्थशास्‍त्र और अर्थशास्‍त्र

अर्थशास्‍त्र और अर्थव्‍यवस्‍था अर्थशास्‍त्र मानव की आर्थिक गतिविधियों का अध्‍ययन करता है। मानव द्वारा सम्‍पन्‍न वैसी सारी गतिविधियों ...